बड़वानी~इसलिये रखा गया काॅलेज का नाम शहीद भीमा नायक पर~~

नवप्रवेशित विद्यार्थियों को बताया शहीद भीमा नायक का इतिहास~~



बड़वानी /आज जिस महाविद्यालय में अध्ययन करते हैं, उसका नाम शहीद भीमा नायक के नाम पर रखा गया है। आपको उनका इतिहास और योगदान ज्ञात होना चाहिए। उनके बारे में जानना गौरव की बात तो है ही साथ ही आगे चलकर इंटरव्यू में भी उनके बारे में प्रश्न करते हैं। ये बातें शहीद भीमा नायक शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बड़वानी के स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्षन प्रकोष्ठ की कार्यकर्ता किरण वर्मा द्वारा बी. ए. प्रथम वर्ष के नवप्रवेशित विद्यार्थियों से कहीं। कार्यकर्ता प्रीति गुलवानिया ने बताया कि कॅरियर सेल नये विद्यार्थियों को भीमा नायक जी के बारे में जानकारी देने के लिए अभियान चला रहा है। उसी के अंतर्गत आज का आयोजन प्राचार्य डाॅ. आर. एन. शुक्ल के मार्गदर्शन में किया गया। इसमें विद्यार्थियों को काॅलेज परिसर में लगे भीमा नायक के अभिलेख का अवलोकन करवाया गया तथा उनके इतिहास के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।

गौरवपूर्ण रहा है इतिहास
डाॅ. शिवनारायण यादव और डाॅ. पुष्पलता खरे के द्वारा किये गये अनुसंधान के आधार पर प्राप्त तथ्यों के आधार पर कॅरियर काउंसलर और इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. मधुसूदन चैबे ने विद्यार्थियों को भीमा नायक का इतिहास बताते हुए कहा कि 1857 में भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया। निमाड़ क्षेत्र में इसका नेतृत्व भीमा नायक ने किया। उन्होंने 1857 से 1867 तक दस वर्ष सतत् संघर्ष किया। भीमा नायक और अंग्रेजों के मध्य जो लड़ाइयां हुई, उनमें 24 अगस्त, 1857 को पंचसावल की लड़ाई,  11 अप्रैल, 1858 की अंबापानी की लड़ाई, 4 फरवरी, 1859 की धाबाबावड़ी की लड़ाई, 09 फरवरी, 1859 की पंचबावली (रामगढ़) की लड़ाई उल्लेखनीय हैं। इनमें उन्होंने अद्भुत शौर्य का परिचय दिया था। भीमा को अंग्रेज दस वर्ष तक पकड़ नहीं पाये थे। अंग्रेजों ने भीमा को पकड़वाने के लिए प्रारंभ में पांच सौ रुपये के ईनाम की घोषणा की। पांच सौ से बढ़ाकर पहले इसे एक हजार और अंततः दो हजार रुपये कर दिया गया। उस समय के लिहाज से यह राषि बहुत बड़ी थी। लालच में आकर चंदर पिता गुलाब ने भीमा के बालकुआं में होने की सूचना अंग्रेजों को दे दी। वहां से अंग्रेजों ने भीमा को 2 अप्रैल, 1867 को गिरफ्तार कर लिया। 9 नवंबर, 1867 को अंग्रेज न्यायाधीष ई. डब्ल्यू. थाम्पसन ने फैसला सुनाया। भीमा को बेड़ी और हथकड़ियों में आजीवन समुद्र पार कारवास में रखने की सजा सुनाई गई। इसके उपरांत भीमा को अंडमान निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में भेजा गया। भारत की मुख्य भूमि से दूर रहते हुए 9 वर्ष बाद 29 दिसंबर, 1876 को भीमा ने कारागार में अंतिम सांस ली। देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भीमा नायक के अद्वितीय योगदान के कारण ही महाविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा गया है। आज लगभग 200 विद्यार्थियों ने भीमा नायक का गौरवपूर्ण इतिहास जाना। आयोजन में सहयोग आशा सोलंकी, अजय चांदोरे, ग्यानारायण शर्मा, रवीना मालवीया, राहुल ने किया।


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