झाबुआ~5 साल पहले ट्रैफिक पुलिस ने हर ऑटो का डाटा रखने जारी किया था टीपी नंबर,अब यह व्यवस्था हुई बंद~~

दूसरे जिले व अन्य राज्यों के ऑटो सड़कों पर भर रहे फर्राटा,पुलिस के पास कोई रिकॉर्ड नहीं~~

परिवहन विभाग व ट्रैफिक पुलिस का उदासीन रवैया व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा-देखना यह है कि जिले की कप्तान भी मुख्यमंत्री की तर्ज पर अब जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई करती है~~

झाबुआ। ब्यूरो चीफ -संजय जैन~~




गत 27 दिसम्बर को गुना में हुए भीषण बस हादसे के बाद भी शहर में ज्यादातर ऑटो बिना टीपी के चल रहे हैं। पुलिस के पास इनकी पहचान करने की कोई व्यवस्था नहीं है। शहर में चल रहे ऑटो की समय-समय पर जांच की जाती है। जिनके पास दस्तावेज नहीं मिलते उन पर कार्रवाई भी की गई है। हालांकि टीपी नंबर ट्रैफिक पुलिस जारी करते हैं। फिर भी बिना टीपी के कोई ऑटो चल रहे है ,इनकी जांच की व्यवस्था परिवहन विभाग व ट्रैफिक पुलिस के उदासीन रवैय पर सवाल खड़ा कर रहा हैं।


जरूरी है इसलिए टीपी नंबर..........................

ट्रैफिक पुलिस स्थानीय स्तर पर ऑटो की पहचान के लिए एक नंबर जारी करती है। जो बड़े अक्षरों में इस पर अंकित किया जाता है। कई लोग ऑटो का रजिस्ट्रेशन नंबर याद नहीं रख पाते हैं। इसलिए इकाई, दहाई और सैंकड़ा की संख्या में यह नंबर होता है। किसी हादसे,वारदात के समय अगर यह नंबर पुलिस को बताया जाता है तो वह अपने रिकॉर्ड से तत्काल ऑटो का पूरा रिकॉर्ड निकाल लेती है। इसमें उसके चालक तक का नाम और मोबाइल नंबर मिल जाता है। यह स्थानीय स्तर पर व्यवस्था होती है। लेकिन 5 साल पहले तक टीपी नंबर जारी करने की व्यवस्था थी,लेकिन अब बंद हो चुकी है। टीपी नंबर उसी ऑटो को मिलता है, जिसके संपूर्ण दस्तावेज होते हैं और वह वैध होता है।

 यातायात पुलिस के पास कोई रिकॉर्ड नहीं.....................

शहर में दौड़ रहे ऑटो का यातायात पुलिस के पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। 5 साल पहले तक जरूर एक टीपी नंबर जारी कर बाकायदा प्रत्येक ऑटो का रिकॉर्ड एक रजिस्टर में संधारित किया जाता है। लेकिन अब यह व्यवस्था पुलिस अधिकारियों की अनदेखी का शिकार हो गई है। यही वजह है कि शहर में दिन-प्रतिदिन ऑटो की संख्या बढ़ती जा रही है,वहीं दूसरे जिले व अन्य राज्यों तक के ऑटो यहां दौड़ रहे हैं। इन ऑटो का कई बार वारदातों तक में अपराधी इस्तेमाल कर रहे हैं। चोरी के माल को इधर से उधर ढोने तक में ऑटो के इस्तेमाल से इंकार नहीं किया जा सकता है। कई ऑटो तो ऐसे हैं जिनके पास संपूर्ण दस्तावेज तक नहीं है,इसके बाद भी सड़कों पर यह चल रहे हैं।


सवाल खड़ा कर रहा परिवहन विभाग व ट्रैफिक पुलिस का उदासीन रवैया व्यवस्था पर .....

कई ऑटो दूसरे जिले व अन्य राज्यों के हैं। ऑटो संचालन में अनियमितता यही तक सीमित नहीं है। शहर में चलने वाले अधिकतर ऑटो में टीपी-ट्रैफिक पुलिस नंबर तक फर्जी है। ऐसे ऑटो की संख्या भी कम नहीं है,जो न तो आरटीओ में रजिस्टर्ड हैं और न ही उनके पास फिटनेस व बीमा सर्टिफिकेट है। इसके बावजूद परिवहन विभाग व ट्रैफिक पुलिस का उदासीन रवैया व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है। शहर में अवैध ऑटो से यात्रियों की सुरक्षा को बड़ा खतरा है। जिन ऑटो के दस्तावेज पूर्ण नहीं है, उससे हादसा होने पर बीमा आदि के दावे को लेकर समस्याएं आती हैं। इसी के साथ कोई वारदात होने पर इसकी पहचान कराना भी मुश्किल होता है।

सबसे ज्यादा आवागमन ऑटो से ही................

शहर में स्कूलों में सबसे अधिक बच्चों को लाने और ले जाने का कार्य ऑटो से ही होता है। वहीं यात्री भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए इन्हीं ऑटो का इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि शहर का विस्तार होने के बाद आवागमन में ऑटो महत्वपूर्ण साधन है।

पहचान ही मुश्किल................
शहर में दौड़ रहे कई ऑटो में हेड और ब्रेक लाइट तक नहीं है। इनके नंबर तक घिस चुके हैं। कुछ काफी पुराने हो चुके हैं। पूर्व में जारी टीपी नंबर तक गायब हैं और नए में तो यह डाले तक नहीं गए है।


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