*अलीराजपुर~टंट्या मामा अमर रहे , के नारों से गूंज उठा अलीराजपुर का दाहोद नाका*~~

*भारतीय स्वतंत्रता सेनानी के वीर योद्धा महामानव भगवान टंट्या मामा के शाहदत दिवस पर समाजजनों ने दि भावभीनी श्रद्धांजलि*~~

✍🏻जुबेर निज़ामी की रिपोर्ट ✍🏻
अलीराजपुर 📲9993116518~~

अलीराजपुर दिनांक 04 दिसम्बर को स्थानीय टंट्या मामा मुर्ति स्थल पर आदिवासी समाज के विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ताओं  एकत्रित होवे । जहाँ पर टंट्या मामा की पूजा अर्चना की गई उसके पशश्चात उनके विचारों को आम जन तक पहुचाने के लिए  आदिवासी छात्र संगठन के पदाधिकारि सवल चौहान ने अपने विचार अभिव्यक्त किये साथी जोबट से पधारे वीरेन्द्र बघेल, लालसिह जी डावर ने भी  टंट्या मामा के विचारों एवं सिद्धान्तों पर प्रकाश डाला कहा आजादी के संघर्ष में ये एक ऐसे योद्धा रहे है जो कि उस समय की विपरीत परिस्थितियों में जंगलों में रहकर अंग्रेजों एव अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपना सशख्त अभियान चलाया जिसके चलते ये योद्धा समष्ट अंग्रेजी हुकूमत के लिए आँख में चुभने लगा एव अंग्रेजों  एवं साहूकार की तमाम कोशिशों के बावजूद भी जब फिरंगीयो की एक भी योजना सफल नहीं हुवी तब फिरंगी सरकार ने उन पर राजद्रोह का मामला लगाया।
कार्यक्रम में मुकेश रावत, अरविंद कनेश, विक्रम चौहान , नितेश अलावा , सरस्वती तोमर, केरम जमरा , मुकेश अजनार,आदि ने टंट्या मामा पर अपने विचार रखे एवं कहा कि टंट्या भील अपने आप मे एक यूनिवर्सिटी है जिनके बारे में जितना अध्ययन किया जाए उतना कम है ये बात अंग्रेजों ने भी मानी और उन्हें रॉबिनहुड की उपाधि दी। आज भी टंट्या भील निमाड़-मालवा सहित आदिवासी समाज मे लोग गीतों के माध्यम से उनके शौर्य को याद किया जाता है। टंट्या भील ने अपने टुकड़ी के माध्यम से अंग्रेजों एव राज रजवाड़ों से लूटा हुवा अनाज एव कपड़े आदि जरूरतमद लोगो मे बाट दिया करते थे जिसके चलते गरीब लोगो के लिए वो मसीहा से कम नहीं थे इसीलिए लोगो ने उन्हे मामा की उपाधि दी क्योंकि वे भूखे को अनाज और वस्त्र विहीन को कपड़े देते थे दुखियों की जड़ी बूटियों से सेवा करते थे इसलिए वो टंट्या भील से टंट्या मामा बन गये।  कार्यक्रम का संचालन रतन सिंह रॉवत  द्वारा किया गया एव आभार रमेश डावर द्वारा किया गया । इस दौरान बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।


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