झाबुआ~मास्क ही बचाव है....कहीं यहीं नारा धोखा तो नहीं .....
कहीं मकसद एक सामान्य बीमारी को महामारी में बदलना तो नहीं है.~~
कभी भी पूरा मुँह ढक कर नहीं सोना चाहिए.....आखिर क्यों....कहा मास्क अनिवार्य रूप से पहनना ही होगा~~
झाबुआ। संजय जैन~~
कोरोना के आते ही अरबों के मास्क और सेनेटॉयझर बिकवाने के बाद संदेहास्पद महामारी के 14 महीने गुजरते ही डब्ल्यूएचओ से लेकर लगभग सभी वैज्ञानिकों एवं चिकित्सकों ने यह स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया कि मास्क से वायरस रूक ही नहीं सकता क्योंकि उसकी पोर साईज वायरस के आकार से लगभग तीन गुना अधिक है।
मास्क वायरस को नहीं रोकता परन्तु ड्रापलेट को रोकता है.....
बाद में कहा गया कि मास्क वायरस को नहीं रोकता परन्तु ड्रापलेट को रोकता है। मान लेते हैं परन्तु ड्रापलेट तो सिर्फ मरीज के खांसने व छींकने से ही निकल सकते हैं और अमेरिका के सीडीसी के अनुसार ऐसा कोई सबूत ही नहीं है कि कोरोना वायरस किसी सतह को छूने से फैल सकता है। यदि अमेरिका का सीडीसी छूने से वायरस फैलने की पुष्टि नहीं कर रहा है तो फिर कुछ मरीजों के खांसने व छींकने से ड्रापलेट निकलने की आशंका दिखाकर देश के करीब 140 करोड़ लोगों पर मास्क की अनिवार्यता लादने का तथा मास्क ही बचाव है......नारे के भीषण प्रचार का आखिर औचित्य क्या है........?
मकसद एक सामान्य सी बीमारी को महामारी में बदलना तो नहीं था....?
कहीं मास्क के भ्रामक प्रोटोकॉल के पीछे विदेशी ताकतों,डब्ल्यूएचओ व वैक्सीन माफिया का मकसद एक सामान्य सी बीमारी को महामारी में बदलना तो नहीं था ....? जीव विज्ञान के अनुसार विदित हो कि हम एक मिनट में करीब 20 बार सांस लेते हैं और हर सांस में हम करीब 400 मिलीलीटर हवा फेफड़ों में खींचते हैं यानी हम प्रति मिनट करीब 8 लीटर हवा तथा पूरे दिन में करीब 11,500 लीटर हवा खींचते हैं। सांस के रूप में जो हम जो हवा खींचते हैं उसमें 21 प्रतिशत ऑक्सीजन,0.04 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड होती है। जबकि जब हम सांस छोड़ते हैं तो उसमें करीब 16.4 प्रतिशत ऑक्सीजन एवं 4.4 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड होती है। यानी 4.6 प्रतिशत ऑक्सीजन ही हमारे शरीर के काम आती है बाकी सारी ऑक्सीजन शरीर से बाहर निकल जाती है,और जहां तक कार्बन डाई आक्साइड का प्रश्न है हम मात्र 0.04 प्रतिशत कार्बन डाई आक्साइड लेकर करीब 4.4 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड बाहर छोड़ते हैं। कुल मिलाकर बात ये है कि हमारे द्वारा प्रति सांस ली गई 400 एमएल हवा में से 18 एमएल एवं दिनभर में ली गई 11,500 लीटर हवा में से करीब 517 लीटर ऑक्सीजन हमारे शरीर के काम काम आती है।
विज्ञान सामान्य सा है....पूरा मुँह ढक कर नहीं सोना चाहिए ....आखिर क्यों....?
मास्क के कारण 100 प्रतिशत ऑक्सीजन बाहर नहीं निकल पाएगी और कुछ मात्रा में ये कार्बन डाई आक्साइड हमारी अगली सांस की हवा के साथ दोबारा हमारे फेफड़ों में पहुँचती जाती है जो कि हमारे फेफड़ों एवं हमारे शरीर की समस्त कोशिकाओं को बीमार और बीमार बना देती है। बचपन में आप सब ने पढ़ा होगा कि कभी भी पूरा मुँह ढक कर नहीं सोना चाहिए ....आखिर क्यों....?
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अधिकतर कुदरती प्रक्रिया पर भी चिंतन और गौर करने लायक बाते......
जैसा की हर शास्त्र यह कहता है कि दुनिया पंचतत्व पर ही चल रही है। वे पंचतत्व है सूर्य,पानी,हवा,आकाश और धरती। सबसे पहले यदि बात करे सूर्य की,तो पुराने समय में अधिकतर व्यक्ति अपने घर के आंगन के ओटले पर नियमित रूप से बैठकर सुबह और शाम में 15 मिनट से आधे घण्टे तक धुप अवश्य सेकते थे, जिससे शरीर में विटामिन-डी की कमी नहीं रहती थी। अब तो फ्लैट और बंगलो में ही हम लोगो ने अधिकतर अपने को कैद कर लिया है। जहा हम पंखे और एयर-कंडीशनर पर ही निर्भर हो चुके है। हमारी परपरा रही है कि हम पानी साफ कपडे से छान कर ही पीते थे। लेकिन इसके बाद हमने पानी को छेड़ा और घरो में आरो मशीनों को लगवा लिया। वर्षो से आरो मशीनों के उपयोग के बाद अब आज हम लोगो को पता चला है कि इसका पानी शरीर के इम्यून सिस्टम को काफी हद तक कमजोर कर रहा है। गौरतलब है कि आसमान से जब बारिश का पानी ज़मीन की तरफ आता है,तब तक पानी हवा में डिस्टील वाटर ही रहता है। लेकिन पानी जैसे ही ज़मीन पर गिरता है,पानी पीने लायक हो जाता है। यह सब व्यवस्था कुदरत ने कुछ सोच समझकर ही की है। लेकिन हम पाश्चात्य संस्कृति के चक्कर में हमारी पुरानी मूल शैली को नष्ट करते चले आ रहे है,जबकि पाश्चात्य संस्कृति वाले हम भारतीयों की मूल शैली का अक्षरशह पालन करने में लगे गए है। आखरी में बची थी हवा....उसे भी हम लोगो ने नही छोड़ा। अब हवा को भी पिछले लगभग 14 माह से मुँह पर मास्क पहनकर,उसे फेफड़ो तक संतुलित मात्रा में न पहुंचने का मार्ग तो प्रशस्त नही कर दिया है....? जिसका परिणाम शायद यह घातक कोरोना की दूसरी लहर तो नहीं .....? यह कहने में कोई अतिश्योक्ति तो नहीं होगी की इससे भी खतरनाक तीसरी लहर हम लोगो को देखना या झेलना पड़ सकती है। भगवान ना करे कुछ ऐसा होवे.......लेकिन हमारा इस पर चिंतन तो बनता ही है।
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शुरुआत से कुछ इस तरह से समझे कॅरोना को.... निर्देश सिर्फ अज्ञानता और अंधेरे में लठ चलाने की तर्ज पर तो नहीं दिए जा रहे है......?
पहली लहर में कोरोना पॉजिटिव मिलने पर उस एरिया को कन्टेनमैंट जोन में तब्दील कर दिया जाता था संक्रमित के घर को सील किया जाता था। सील किये घर पर जो जाली लगायी जाती थी,उस जाली से बड़ा चूहा भी आसानी से निकल जाता था,जबकि कोरोना वायरस सूक्ष्म मशीन से भी नहीं देखा जा सकता है। साथ ही पहली लहर में मरीज को एक डकैत की तरह पुलिस के सहारे अस्पताल भेजा जाता था। दुकानदारों को अपनी दुकानों के बहार सफ़ेद गोले बनाना एवं सेनेटॉयझर का उपयोग अनिवार्य किया गया था,साथ ही जुर्माने का भी प्रावधान था। अब इस खतरनाक दूसरी लहर में यह उपरोक्त सारे नियम पूर्ण रूप से नदारद हो गए है। आज दूसरी लहर इतनी खतरनाक होने के बावजूद भी एरिया को कन्टेनमैंट जोन,संक्रमित के घर को सील और मरीज को एक डकैत की तरह पुलिस के सहारे अस्पताल ले जाने जैसी प्रक्रिया सम्पूर्ण रूप से गायब कर दी गयी है। उसके बाद प्रचारित किया गया की आप हाथ को बार-बार साबुन से धोये हुए और सेनेटॉयझर का इस्तेमाल करे। दूसरी लहर में अब लगभग सेनेटॉयझर का उपयोग सिर्फ सार्वजनिक स्थानों और हॉस्पिटल में ही देखने को मिल रहा है। उपरोक्त सारे निर्देशों के बाद अब तो हद ही हो गयी कि करोडो रूपये रेमडिसीवीर इंजेक्शन,प्लाज्मा,स्टेरॉयड और सिटी स्कैन पर आमजन का खर्च कर देने या यह भी कह सकते है कि आमजन का पूर्ण रूप से खून चूस लेने के बाद,उपरोक्त का उपयोग इस महामारी के लिए नहीं किया जा सकता है,वाला निर्देश अभी हाल ही में जारी कर दिया। अब वेक्सीनशन का जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है। जिसके तहत प्रधानमंत्री मोदी खुद ने वैक्सीन का पहला डोज़ और ठीक 21 दिन बाद दूसरा डोज लगाने के बाद आमजन को समझाइस दी थी कि आप भी अपना वक्सीनसेशन करे और दूसरा टिका भी 21 दिन बाद अवश्य लगवाए,जबकि आज इसके विपरीत स्थति यह हो गयी है कि अब दूसरे डोज कब लगेगा.....? इस बात की आमजन में कोई भी स्थति साफ है ही नहीं ....कोई कहता है की 42 दिन बाद,तो वेबसाइट पर कहा जा रहा है कि 3 से 6 माह के बाद अब दूसरा डोज लगवाना है। उपरोक्त सारे नियम और निर्देश हर बार बारी-बारी से बदलने से,तो यह साफ नजर आ रहा है कि सारे निर्देश सिर्फ अज्ञानता और अंधेरे में लठ चलाने की तर्ज पर तो नहीं दिए जा रहे है......? विचारणीय बात तो यह है कि भविष्य में भी ऐसे ही निर्णय आमजन पर अज्ञानता के चलते थोपे तो नहीं जायेंगे.......?
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तर्क का खण्डन या इस नियम को रद्द करना चाहिए....सवाल स्पष्ट है क्या मास्क से मानव स्वास्थ्य को कोई भी हानि नही होती है ....?
मेरी केन्द्र,राज्य सरकार व प्रशासन से भी से अपील है कि या तो मास्क से होने वाली इस विकराल हानि पर अविलम्ब वैज्ञानिक सबूतों के साथ अपना तार्किक स्पष्टीकरण जारी करे अन्यथा डब्ल्यूएचओ के धूर्तता पूर्ण प्रोटोकाल के तहत प्रचारित मास्क लगाने के नियम को रद्द करना चाहिए। एक साल से प्रोटोकॉल के नाम से लागू इस अवैज्ञानिक नियम ने इस देश को भयंकर रूप से बीमार बनाने में एक अति महत्वपूर्ण भूमिका तो नहीं निभाई है.....? कही इस नियम की वजह से लोग हाइपर केपनिया यानी आक्सीजन की कमी की समस्या से भयंकर रूप से तो नहीं जूझ रहे हैं या मर रहे हैं...? इतना ही नहीं ये समस्या समय के साथ विकराल रूप ले सकती है,जिसकी चपेट में कई पुलिस ,डॉक्टर्स जैसे फ्रंटलाइन वर्कर्स आ भी चुके हैं।
ना तो भ्रम फैला रहा हूँ और ना ही किसी पर आरोप लगा रहा हूँ.....
मैं संजय जैन,जिला प्रमुख-दैनिक दोपहर-झाबुआ ना तो भ्रम फैला रहा हूँ और ना ही किसी पर आरोप लगा रहा हूँ। देश के सामान्य नागरिक के रूप में अपनी सामान्य बुद्धि से कुछ सवाल उठा रहा हूँ क्योंकि कुछ सवाल हैं,जो मुझ जैसे हजारों हजार लोगों के मन में कोरोना प्रोटोकॉल, खासकर मास्क लगाने एवं शवों को बिना पोस्टमार्टम पॉलिथीन में पैक करके देने जैसे नियमों के कारण उठ रहे हैं। गौरतलब है कि 2 मई 2020 में बॉम्बे हाईकोर्ट में एक मामले की जांच व सुनवाई के दौरान कोर्ट ने निर्णय दिया था कि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि शव से कोरोना वायरस का प्रसार हो सकता है या होता है। बावजूद इसके कोरोना का टैग लगे शवों को प्रोटोकॉल के नाम पर परिजनों द्वारा ना छूने की सख्त हिदायत के साथ पॉलीथिन बैग में पैक करके दिया जा रहा है।
मास्क अनिवार्य रूप से अवश्य पहनना ही होगा....
गौरतलब है कि मिनिस्ट्री ऑफ़ हेल्थ एमओएचएफ़ डब्लू ने खुद अपनी गाइड लाइन में साफ लिखा है कि स्वस्थ व्यक्ति जिसे कोई भी लक्षण नहीं है ,को मास्क पहननाना अनिवार्य नहीं है। फिर स्वस्थ आम जान पर दबाव और जुर्माना क्यों किया जा रहा है .....? मेरी इस खबर को पढ़कर स्वस्थ व्यक्ति को बेपरवाह नहीं होना है। उसे भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में ,यदि वह अस्पताल में जा रहा है या किसी बीमार व्यक्ति के पास है तो उसे इन सभी परिस्थतियो में खुद की सुरक्षा हेतु मास्क अनिवार्य रूप से अवश्य पहनना ही होगा।
देश को श्मशान में बदलते नहीं देख सकता हूँ.......
कुछ भी करो परन्तु इस सच्चाई-भ्रम पर से पर्दा उठाओ वो भी सटीक तर्को के साथ। लॉकडाउन,गिरते मनोबल,बीमारी के बिगडते रूप एवं अनिश्चित भविष्य के चलते पूरा देश अनिश्चित काल तक ना खत्म होने वाली आर्थिक गुलामी की ओर तेजी से बढ़ रहा है। मैं अपनी अंतिम सांस तक बोलता रहूंगा क्योंकि मैं अपने महान् देश को शमशान में बदलते नहीं देख सकता हूँ.......क्यों पूरे देश को मरघट में बदलने के दुष्चक्र में अपने को जाने-अनजाने में सहयोगी बना रहे हो.......?
प्रशासन से भी अपील.........
मेरी प्रशासन से अपील है कि वो स्वप्रेरणा से व संज्ञान लेकर ही निर्णय ले। प्रशासन से अभी भी जनता को उम्मीद है,जागो और बताओ कि आखिर क्या सही है और क्या गलत.....? जनता को तो कोई जवाब देना ही नहीं चाहता।

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