झाबुआ~ मजदूर की मजबूरी या मजबूर की मजदूरी.... पलायन करते मजबूर मजदूर~~

मतदान संपन्न होने के साथ ही फिर से पलायन पर जा रहे गा्रमीण-बस स्टेंड पर आम तौर पर दिखाई देता है ऐसा नजारा ~~

झाबुआ। संजय जैन~~


प्रजातंत्र का प्रमुख त्योहार मतदान करने का खत्म होते ही रोजी रोटी की तलाश में ग्रामीण मजदूरों का पलायन शुरू हो गया हेै। ग्रामीण परिवार सहित मजदूरी के लिए राजस्थान,गुजरात सहित महाराष्ट्र की ओर रुख कर रहे हैं। बस स्टैंड पर सुबह से ही पलायन करने वाले ग्रामीणों का तांता लगाना शुरू हो जाता है। गुजरात व राजस्थान की बसों में तो पैर रखने की तक की जगह नहीं मिल पाती है। जिले से पलायन नाम का कलंक मानो मिटने का नाम हीं ले रहा है। जिले से प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में ग्रामीणजन, जिसमें महिला-पुरूष एवं बच्चें पलायन करते हुए गुजरात एवं राजस्थान के विभिन्न शहरों में काम करने के लिए जाते है,जहां उन्हें मजदूरी तो अच्छी मिलती है,लेकिन वहां उनका भारी आर्थिक एवं शारीरिक शोषण किया जाता है। 

*** भेजा गया मतदान के लिये यहां 2 -2 दिन की पगार देकर ~~


हर साल झाबुआ जिला मुख्यालय के बस स्टैंड तथा जिले में प्रमुख रेलवे स्टेशन मेघनगर पर पलायन करने वालों की संख्या काफी दिखती है। सबसे अधिक ग्रामीण गुजरात राज्य का रुख करते हैं। अंचल के ग्रामीण बड़ौदा,अहमदाबाद,राजकोट, सूरत,मोरवी सहित महाराष्ट्र व राजस्थान के बड़े शहरों में मजदूरी की तलाश में जाते हैं। मंगलवार को स्थानीय बस स्टेंड पर परिवार एवं छोटे छोटे बच्चों के साथ बडी संख्या में बसों एवं वाहनों का इन्तजार करते हुए दिखाई दिये। इनमे से कुछ मजदूरों ने बताया कि मनरेगा में काम बंद पड़े हैं। पिछले साल से सामग्री का भुगतान नहीं हुआ है। लाखो की मजदुरी पैसा बाकी है। मजदूरी का भुगतान भी कई-कई महीनों बाद हो रहा है ऐसे मे गुजरात,राजस्थान में जाकर प्रतिदिन 500 रुपये  तक प्रति व्यक्ति आमदनी हो जाती है । विशेषकर ऐसे गरीब लोग जिनकी खेती लायक जमीन नही है उन्हे घर परिवार को चलाने के लिये उन्हे मजदुरी के लिये बाहर का रूख करना आवश्यक हो गया है। यह वजह भी मजदूरों के पलायन की है। जो मजूदर गुजरात आदि मजदूरी के लिये गये हुए थे,उन्हे मतदान के लिये यहां 2 -2 दिन की पगार देकर भेजा गया था। अब मतदान का काम निपट जाने के बाद वे फिर से अपने अपने कार्यस्थलो के लिये अपने बच्चों आदि के साथ जा रहे है।

*** पलायन पर जाने पर जिले के ग्रामीणों का होता है आर्थिक एवं शारीरिक शोषण ~~


ग्रामीणजनों की सीधी-साधी प्रवृत्ति होने के कारण वह साइड पर कार्य करवाने वाले ठेकेदार एवं उनके अधीनस्थ काम करने वाले लोगों के बहकावे में आ जाते है, जिसका वे भरपूर फायदा उठाते है उनका जमकर शोषण करते है। विशेष रूप से इस तरह के मामले शारीरिक शोषण के देखने को मिलते है। ग्रामीणजन इन शहरों में फेक्ट्रीयों में काम करने से सिलिकोसिस जैसी भयावह बिमारी का शिकार होते है,वहंी उन्हें दमा,अस्थमा के साथ गर्भवती मां अपने शिशु का पालन-पोषण ठीक ढ़ंग से नहीं कर पाने के कारण उनके बच्चें कुपोषण का शिकार हो जाते है। जिले में कुपोषण के आने वाले अधिकतर मामलों में पलायन करने वाले ग्रामीणों के बच्चों के ही रहते है। ठेकेदारों एवं उनके अधीनस्थ काम करने वाले कर्मचारियों द्वारा ग्रामीण महिलाओं, युवतियों का मौका मिलने पर शारीरिक शोषण किया जाता है। यदि इस तरह के मामलों में खोजबीन की जाए, तो इन शहर में कई मामले ऐसे नजर आएंगे जिनमें कई ग्रामीण महिलाएं शारीरिक शोषण की पाई जाएगी,लेकिन ठेकेदार एवं अधीनस्थ कर्मचारियों के दबाव के चलते वे अपनी पीढ़ा कहीं भी बयां नहीं कर पाती है एवं चुप चाप सहन करती है।

*** शासन-प्रशासन की विफलता का परिणाम~~

जिले से ग्रामीणों के पलायन पर जाने का मुख्य कारण उन्हें अपने गांव,नगर,शहर में रोजगार का ना मिलना है और जब रोजगार मिलता भी है तो उन्हें अपने काम की मजदूरी नहीं दी जाती है। मजदूरी के लिए महीनों उन्हें चक्कर कटवाए जाते है। ऐसी स्थिति में उनके सामने पलायन करने के अलावा ओर कोई रास्ता नहीं बचता है। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, इंदिरा आवास, कपिल कूप धारा योजना, तालाब निर्माण संबंधी कई योजनाएं बनाई जाती है, लेकिन उसका फायदा बिचैलियों ही ले लेते है, ग्रामीणों तक उसका लाभ नहंी पहुंच पाता है, परिणाम स्वरूप उन्हें पलायन करना पड़ता है। जिस जिला प्रशासन के अधिकारियों पर इन योजना में हो रहे कार्यों की निगरानी का जिम्मा होता है, वह महज एसी कक्ष में आराम फरमाते नजर आते है एवं कागजों में योजनाओं के तहत शत-प्रतिशत कार्य पूर्ण एवं सफल होना बता दिया जाता है, लेकिन हकीकत कुछ ओर होती है। ग्रामीणों द्वारा जनसुनवाई एवं ज्ञापनों के माध्यम से भी अपनी पीढ़ा को शासन-प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत किया जाता हे, लेकिन अधिकतर मामलों में उनकी कोई सुनवाई होती है, यह स्थिति जिले से ग्रामीणों के पलायन का मुख्य कारण है।


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