बदनावर~~105 साल का हुआ हिंदी सिनेमा~~
पारिवारिक फिल्में बनाने में सिद्ध हस्त थे ताराचंद बड़जात्या~~
हिंदी प्रेमी भारतीय संस्कृति के समर्थक थे बड़जात्यां~~
आज के दिन ही डाक विभाग ने 50 टिकट का सबसे बडा सेट जारी किया था~~
बदनावर (विश्वाससिंह पंवार)
3 मई 2013 को भारतीय सिनेमा के 103 वर्ष पूर्ण होने पर 50 डाक टिकटो का सेट जारी किया था भारतीय डाक विभाग ने जो कि एक बड़ी घटना थी ।
भारतीय डाक विभाग के इतिहास में एक साथ इतने टिकटों का सेट पहली बार जारी हुआ था । भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के ने इसी दिन देश की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र का प्रदर्शन किया था ।
50 टिकटो के सेट में फाल्के पुरस्कार से सम्मानित व्यक्तियों के साथ कई जानी मानी फिल्मी हस्तियो के टिकट जारी हुए थे । जिसमें ताराचंद बड़जात्या पर भी एक टिकट जारी हुआ था । जिसने उन्हें हाथ में कलम लेकर ऑफिस में बैठे हुए दर्शाया गया है। यह टिकट ₹5 का होकर जैन डाक टिकटों की लिस्ट में 41 नंबर पर आता है । ताराचंद बड़जात्या भारतीय सिनेमा की प्रमुख हस्तियों में से एक थे । ताराचंद बड़जात्या का जन्म जैन परिवार में होने से उनकी फिल्मों में जैन सिद्धांतों की झलक एवं भारतीय संस्कृति की शुद्ध और सात्विक छवि प्रदर्शित होती दिखाई देती है ,जो कि रुपहले पर्दे का एक नया प्रयोग रहा । रोमांटिक मसाला और एक्शन फिल्मों के दौर में भी ताराचंद बड़जात्या ने अपनी पारिवारिक फिल्मों से अच्छा नाम कमाया उक्त जानकारी देते हुए डाक टिकट संग्रहक (फिलाटेलिस्ट) ओम पाटोदी ने बताया कि 10 मई 1914 को राजस्थान मे जन्मे बड़जात्या भारत के प्रसिद्ध फिल्म-निर्माता थे। उन्होने सन 1960के दशक से आरम्भ करके 1980 के दशक तक अनेकों हिन्दी फिल्में बनाई वे राजश्री प्रोडक्शन्स के संस्थापक थे। वे मानवीय मूल्यों पर आधारित पारिवारिक फिल्में बनाने में सिद्धहस्त थे ।
उन्होंने कोलकाता के विद्यासागर कॉलेज से स्नातक की परीक्षा पास करके 19 वर्ष की आयु में 1933 में मोतीमहल थियेटर में बिना किसी वेतन के एक प्रशिक्षु के रूप में काम करने लगे कडी मेहनत और लगन से उन्होंने अपने मालिक के लिए सफलता अर्जित की ।
15 अगस्त 1947 में उन्होंने राजश्री पिक्चर्स प्रा. लिमिटेड की स्थापना की और कम लागत, देशी कलेवर, नये कलाकारों और सार्थक मूल्यों के सहारे फिल्में बनाने लगे. आर्थिक रूप से उन्हें इस बात का लाभ मिला कि उन्होंने जिन फिल्मों के वितरण का अधिकार मिला उनमें अधिकतर खूब चलीं. जिन फिल्म निर्माता निर्देशकों ने उनपर पूरा भरोसा किया उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण नाम मनमोहन देसाई का था जिन्होंने अपनी कई सफल फिल्मों -अमर अकबर अंथोनी, परवरिश, धरमवीर, कुली आदि फिल्मों के वितरण का अधिकार उन्हें सौंपा. जिन सफल फिल्मों से उन्हें सबसे अधिक लाभ मिला उनमें शोले, जुगनू, रोटी, कपड़ा और मकान और विक्टोरिया नं 203 प्रमुख हैं।
बडजात्या का एक बड़ा
योगदान यह भी है कि उनके माध्यम से दक्षिण भारतीय फिल्म जगत से हिंदी समाज ज्यादा जुड पाया। अपने दक्षिण भारत के फिल्म निर्माण क्षेत्र में अनुभवों के आधार पर उन्हें लगा कि इन क्षेत्रीय फिल्मों को राष्ट्रीय आधार मिलना चाहिए। उन्हें विश्वास था कि दक्षिण भारतीय भाषाओं की सफल फिल्मों को हिन्दी क्षेत्र के दर्शक जरूर पसंद करेंगे. शुरू में जेमिनी, ए वी एम, प्रसाद जैसे बडे निर्माताओं को यह भरोसा नहीं था लेकिन जब ताराचन्द बरजात्या ने उन्हें भरोसा दिलाया और वितरण में मदद का वादा किया तब उन्हें भरोसा हुआ। इस क्रम में हिंदी में चन्द्रलेखा, मिलन, संसार, जीने की राह, ससुराल, राजा और रंक और खिलौना जैसी सफल फिल्में बनी. 1962 में ताराचंद ने अपना स्वतंत्र प्रोडक्शन शुरू किया। इसके बाद एक के बाद एक सफल फिल्मों का सिलसिला शुरू हुआ। आरती (1962) से शुरू हुआ सफर दोस्ती, जीवन-मृत्यु, उपहार, पिया का घर, सौदागर, गीत गाता चल, तपस्या, चितचोर, दुल्हन वही जो पिया मन भाए, अँखियों के झरोखे से, तराना, सावन को आने दो, नदिया के पार, सारांश से होता हुआ मैंने प्यार किया तक चलता रहा. 1992 में उनका देहांत हो गया।
अपनी फिल्मों में वे मानवतावादी भारतीय मूल्यों के प्रति संवेदनशील दिखे. उन्हें लगता था कि देश की भाषा, देशी संगीत और देशी भाव-बोध अगर सार्थक रूप में लोगों के सामने लाया जाए तो लोगों की सराहना मिलेगी बिल्कुल ऐसा ही हुआ।
एक दूसरी प्रमुख बात यह थी कि वे नये कलाकारों और संगीतकारों को सदैव प्रोत्साहित करते रहे. उन्होंने जिन लोगों को पहला बड़ा ब्रेक दिया उनमें ये नाम शामिल हैं- राखी, जया भादुडी, सारिका, रंजीता, रामेश्वरी, सचिन, अनुपम खेर, अरुण गोविल, माधुरी दीक्षित, सत्येन बोस, बासु चटर्जी, सुधेन्दु राय, लेख टंडन, हीरेन नाग, रवींद्र जैन, बप्पी लाहिड़ी, उषा खन्ना, येसुदास, हेमलता, सुरेश वाडेकर, शैलेन्द्र सिंह, कविता कृष्णमूर्ति, अनुराधा पोरवाल उदित नारायण और अलका याज्ञनिक अपनी फिल्मों में वे भारतीय समाज के सकारात्मक पक्ष को ज्यादा दिखाने की कोशिश करते थे। हिंदी का प्रयोग वे शुरू से आखिर तक करते रहे और उनकी फिल्मों में जो नाम दिखाये जाते थे वे भी हिंदी में ही होते थे।
आज भी उनके पौत्र सूरज बडजात्या हिंदी फिल्म जगत के विरल लोगों में हैं जो स्क्रीन-प्ले हिंदी में तैयार करवाते हैं।
इन्हीं गुणों के कारण खूबियों के कारण भारतीय सिनेमा जगत ताराचंद बड़जात्या को हमेशा याद करता रहेगा ।

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